Passt nicht? Macht nichts! Sie können Artikel bis zu 30 Tage zurückgeben
Mit einem Geschenkgutschein können Sie nichts falsch machen. Der Beschenkte kann sich im Tausch gegen einen Geschenkgutschein etwas aus unserem Sortiment aussuchen.
Bis zu 30 Tage Rückgaberecht
जानी-मानी कथाकार क्षमा कौल ने 'उन दिनों कश्मीर' शीर्षक उपन्यास में समय,समाज और उसकी विकृत राजनीति के परिप्रेक्ष्य में समकालीन जीवन की सच्चाई व तिलमिला
देनेवाली अनुभूतियों को अपने चिर-परिचित बेफिक्र व
साफगो शैली में वाणी दी है। उन्होंने जम्मू प्रांत में दो
महीनों तक चले वर्ष 2008 के 'स्वामी अमरनाथ आंदोलन '
को, जिसे लोग 'बम-बम भोले' आँदोलन के नाम से भी याद करते हैं, मेटाफर के रूप में इस तरह उभारा है कि भारतीय राजनीति के ओढ़े हुए एकतरफा सेक्यूलर चेहरे और उससे बने असहज व कृत्रिम जीवन की अनेक तहें उद्घाटित होती हैं। ये परतें इतनी असहज व कृत्रिम हैं
कि उसमें विरोध न करने,गलत होते देखने,अन्याय को चुपचाप सह जाने आदि को सामान्य जन के लिए सद्भाव बताया गया है। किंतु इकसठ वर्ष के बाद
'स्वामी अमरनाथ आंदोलन ' में कुछ ऐसा घटित हुआ कि इस
असहजता ने जन-जन के भीतर विस्फोट का रूप ले लिया। क्षमा कौल एक कुशल चितेरे की तरह
परिस्थितिजन्य आंदोलनधर्मी भाषा तथा जीवन के अंतःसम्बंधों का निर्वाह करती हैं और जम्मू प्रांत के जन-जन के आर्त्तनाद को,अन्याय के प्रतिकार को, क्रोध को,छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सक्रिय सत्ता-लोलुप
राजनीतिक स्वार्थपरता को केंद्रीयता प्रदान करती हैं।
गली-कूचों,सड़कों,बाजारों, गाँवों,कस्बों,घर-मकानों,मंदिरों,
अस्पतालों,जेल-कोतवाली हर जगह राज्यतंत्र एवं जिहादी व अलगाववादी तत्त्वों के खिलाफ
आस्थावान स्त्रियों,नन्हें-मुन्नों, किशोरों,युवाओं,अधेड़ों,वृद्धों, बालकों,पढ़े-लिखों, अनपढ़ों, किन्नरों आदि सबने मिलकर गगनभेदी गर्जना की- 'बम-बम भोले!' यह था आस्था और आत्म-सम्मान का नाभिनाल प्राकट्य।राज्य और कट्टरतावादी तत्त्वों की मिलीभगत से अपना
यह एकमात्र संबल छीने जाने के विरोध में जनता की जोखिम भरी हुंकार।उपन्यास में यह नारा ज
Hallo! Ich bin Libroamiko, dein Buchberater.
Wie kann ich dir helfen?