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तेजी से उभरते कवियों में कारुलाल जमड़ा की विशिष्ट पहचान यह है कि उनकी कविताएँ घर में उगाई गई हैं और उन्हें सींचने वाले असंख्य मित्रों को मैंने हमेंशा ही कविताओं के आस पास घेरा बना कर खड़ा हुआ देखा है । इस हिसाब से ये सबकी सब कविताएँ कवि जमड़ा जी की ही नहीं हैं , ये कविताएँ मित्रों के साथ -साथ माँ, बहन, पिता, बेटियों, गली-मोहल्ले के लोगों और निकट के रिश्तेदारों की बपौती या उससे भी कुछ ज्यादा लगती हैं । मैं कविता को अमूर्त नहीं मानता । कवि उसे अपनी आँखों से देखता है और आप यदि कवि के साथ खड़े हैं तो आप भी उसे खुली आँखों से देख सकते हैं । कवि जमड़ा जी के साथ खास यह है कि वे कविता को देखते समय अपनी माँ और पिता को बराबरी से शामिल करते हैं । कवि का घर ही जब कविता का प्रसूतिगृह भी हो, तब सहज ही कविता की किलकारियों से गूँजता हुआ घर का आकाश प्रेम के सुवर्ण-रेशों से जगमगाता हुआ हमारा ध्यान आकर्षित करने लगता है ।
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